विपक्ष की विश्वसनीयता का संकट – रजनीश अग्रवाल

भारत में विपक्ष आज गंभीर विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है। लगातार जिस प्रकार के विषय, विचार और मुद्दे विपक्ष उठा रहा है, वे न तो तर्कसंगत हैं और न ही तथ्यपरक। आम आदमी की बुनियादी सुविधाओं से लेकर आकांक्षी भारत की अपेक्षाओं और देश की नीतिगत चुनौतियों तक, विपक्ष प्रभावी भूमिका में दिखाई नहीं देता। जनता के वास्तविक प्रश्नों पर ठोस विकल्प देने के बजाय वह नैरेटिव की ऐसी आभासी लड़ाई में उलझा है, जिसकी बुनियाद कई बार तथ्यों से अधिक मात्र राजनीतिक आरोपों पर दिखाई देती है।लोकतंत्र में सरकारों की समीक्षा बहुत होती है लेकिन विपक्ष की नहीं।देश ने विपक्ष को संवैधानिक भूमिका सौंप रखी है। विपक्ष अपनी इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता । संकट तब और गहरा जाता है जब अपनी यह भूमिका निभाना तो दूर बल्कि विपक्ष का नेतृत्व हठधर्मी हो जाए एवं उसपर सामंती अहंकार सवार हो।देश को अराजकता पर धकेलने का प्रयास होता है।
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक कांग्रेस स्वयं या विभिन्न दलों के समर्थन से केंद्र की सत्ता में रही। देश की आर्थिक नीतियों, बजट, प्रशासनिक व्यवस्था और विकास की दिशा तय करने में उसकी निर्णायक भूमिका रही। बीच में गैर-कांग्रेसी सरकारें भी आईं, लेकिन कई दशकों तक राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। इसलिए उसके लंबे शासन की उपलब्धियों के साथ उसकी विफलताओं और नीतिगत निर्णयों की जवाबदेही से भी उसे बचाया नहीं जा सकता। समय के साथ भ्रष्टाचार के आरोप, प्रशासनिक अकर्मण्यता, नीतिगत असमंजस और नेतृत्व से जुड़े प्रश्न राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आए। जनता के बीच असंतोष बढ़ा और कांग्रेस का राजनीतिक आधार कमजोर होता गया।
2014 में इस असंतोष ने निर्णायक रूप लिया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और केंद्र में भाजपा नीत सरकार बनी। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक व्यवस्था के प्रति जनता के बदलते रुझान का स्पष्ट संकेत था। यहीं से विपक्ष के सामने आत्ममंथन का अवसर था। चुनावी पराजय के कारणों को समझना, संगठन और नेतृत्व की कमियों को स्वीकार करना तथा जनता के सामने नई नीतियों और नए विकल्प के साथ जाना किसी भी लोकतांत्रिक दल का स्वाभाविक रास्ता होना चाहिए। विपक्ष के एक हिस्से ने इसके बजाय चुनावी जनादेश पर ही प्रश्न उठाने शुरू कर दिए। माइनॉरिटेरियन डेमोक्रेसी, पोस्ट ट्रुथ पॉलिटिक्स, मेनूफ़्रैक्चरड वेब जैसे शब्द गढ़ कर 2014 के जनादेश को झुठलाने का प्रयास हुआ। बाद में EVM के बहाने नए जनादेश को ग़लत बताया जाने लगा। चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन गंभीर आरोपों को प्रमाणित करना भी उतना ही आवश्यक है। निर्वाचन आयोग ने EVM में कथित छेड़छाड़ को प्रदर्शित करने का अवसर राजनीतिक दलों को दिया। इसके बावजूद आज तक ऐसा कोई प्रमाणित मामला सामने नहीं आया जिसने यह सिद्ध किया हो कि देश के चुनावों में EVM के माध्यम से व्यवस्थित रूप से जनादेश बदला गया। VVPAT और मतगणना की निर्धारित प्रक्रियाएँ चुनावी सत्यापन का हिस्सा हैं। क्या आज तक किसी भी मतदान केंद्र पर ईवीएम की गणना और वीवीपेट पर्ची की गणना में कोई अंतर पाया गया ? क्या इस बारे में कोई इसे गलत ठहराते हुए किसी प्रकरण पर न्यायालय ने कोई निर्णय दिया है ? प्रश्न EVM पर सवाल उठाने का नहीं, बल्कि उस सवाल को प्रमाणित करने का है। किसी आरोप को लगातार दोहराने से वह तथ्य नहीं बन जाता। लोकतंत्र में संदेह की जगह है, लेकिन संदेह को प्रमाण का स्थान नहीं दिया जा सकता।
अब इस बार चुनाव आयोग को ही संदिग्ध बनाने के कार्य किया जा रहा है। SIR के बहाने या कभी किसी अख़बार की खबर के आधार पर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े कर एक संवैधानिक संस्था को बिना किसी साक्ष्य के संदिग्ध बनाकर स्वयं नेतृत्व और अपने दल की घोर पराजय से मुँह छिपाया जा रहा है। यहाँ तक कि इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। विपक्ष की समस्या यहीं समाप्त नहीं होती। सरकार की नीतियों से असहमति उसका लोकतांत्रिक अधिकार और दायित्व है लेकिन केवल विरोध किसी राजनीतिक दल को विकल्प नहीं बनाता। आज का भारत आकांक्षी भारत है। जिसे नरेंद्र मोदी ने समझा है और उस ओर अपनी सरकार के तेजी से कदम बढ़ाये हैं। आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनावी राजनीति और सरकार का विमर्श बदला है। नागरिक बेहतर सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा के साथ आधुनिक बुनियादी ढाँचा, तकनीक, निवेश के नए अवसर पर चर्चा करता है।
इन प्रश्नों पर विपक्ष की अपनी स्पष्ट नीति और रोडमैप क्या है। यह अधिक महत्वपूर्ण सवाल है। किसी सरकारी योजना को गलत बताने के साथ यह बताना भी जरूरी है कि गलती कहाँ है, उसका समाधान क्या है और सत्ता में आने पर उससे बेहतर क्या किया जाएगा। जनता केवल यह नहीं सुनना चाहती कि सरकार ने क्या गलत किया। वह यह भी जानना चाहती है कि विपक्ष क्या सही करेगा। पिछले एक-डेढ़ दशक में विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा सरकार की नीतियों के विकल्प देने के बजाय नैरेटिव की राजनीति में अधिक सक्रिय दिखाई दिया है। चुनाव प्रक्रिया से लेकर संस्थाओं तक अनेक विषयों पर सवाल उठाए गए लेकिन आरोपों को प्रमाण और विरोध को वैकल्पिक नीति में बदलने का प्रयास उतना स्पष्ट नहीं दिखा।कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के लिए चुनौती अपने लंबे राजनीतिक अतीत का ईमानदार मूल्यांकन करने, पराजय के कारणों को स्वीकार करने और बदलते भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप स्वयं को पुनर्गठित करने की है।
भारत को मजबूत विपक्ष चाहिए। ऐसा विपक्ष जो सरकार से कठिन सवाल पूछे, उसकी कमियाँ उजागर करे लेकिन तथ्यों के साथ। ऐसा विपक्ष जो संस्थाओं पर प्रश्न उठाए लेकिन प्रमाण के साथ। ऐसा विपक्ष जो सरकार का विरोध करे तो उसके सामने बेहतर नीति और स्पष्ट विकल्प भी रखे। यह भाजपा ने किया है उन राज्यों में जहाँ विपक्ष में है वहाँ भी यही भूमिका निभा रही है।विपक्ष की असली लड़ाई किसी एक सरकार या किसी एक नेता के विरुद्ध नैरेटिव खड़ा करने की नहीं, अपनी विश्वसनीयता पुनः अर्जित करने होनी चाहिए।
जनादेश का सम्मान, अपनी पराजय का आत्ममंथन, आरोपों के स्थान पर प्रमाण, नैरेटिव के स्थान पर नीति और विरोध के स्थान पर विकल्प—यही किसी भी विपक्ष को जनता के बीच फिर से विश्वसनीय बना सकता है।लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक है। विपक्ष को तय करना होगा कि वह केवल सरकार का विरोध करना चाहता है या वास्तव में देश के सामने एक विश्वसनीय विकल्प बनना चाहता है।
लेखक-भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मंत्री व राज्यसभा सांसद है।



