मुरैना जिले के ऐंती पर्वत पर स्थित प्राचीन एवं पावन श्री शनिदेव मंदिर परिसर में प्रति वर्ष शनिश्चरी अमावस्या के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। यह पावन स्थल श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का केंद्र है, जहाँ दूर-दराज़ से भक्तगण शनिदेव के दर्शन हेतु उमड़ते हैं। इस वर्ष यह मेला 23 अगस्त 2025 को आयोजित किया जाएगा।
पौराणिक मान्यताएँ एवं किंवदंतियाँ ऐंती स्थित यह शनिदेव मंदिर भारतवर्ष के प्राचीनतम मंदिरों में से एक माना जाता है, जिसकी उत्पत्ति त्रेतायुग में बताई जाती है। यहाँ स्थापित शनिदेव की प्रतिमा अत्यंत विशिष्ट और रहस्यमयी है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यह प्रतिमा एक उल्कापिंड से निर्मित है, जो आकाश से पृथ्वी पर गिरा था। एक अन्य लोकप्रिय कथा के अनुसार, लंकापति रावण के अत्याचारों से शनिदेव को मुक्ति दिलाने हेतु भगवान हनुमान ने अपने बुद्धि और बल का प्रयोग किया। जब शनिदेव कई वर्षों तक रावण के चरणों तले दबे रहे, तब वे अत्यंत दुर्बल हो गए थे। लंका दहन से पूर्व शनिदेव ने हनुमान जी से निवेदन किया कि जब तक वे लंका में रहेंगे, तब तक दहन संभव नहीं है। अपनी दुर्बलता के कारण वे स्वयं लंका छोड़ने में असमर्थ थे। तब हनुमान जी ने उन्हें अपनी पूरी शक्ति से भारत भूमि पर फेंका, जिससे शनिदेव मुरैना जिले के ऐंती पर्वत पर आ गिरे। यही पर्वत कालांतर में ‘शनि पर्वत’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
शास्त्रों में वर्णन है कि इसी पर्वत पर शनिदेव ने कठोर तपस्या कर पुनः शक्ति व बल प्राप्त किया। शनि मंदिर का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य ऐतिहासिक दृष्टि से यह मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने स्वयं इस स्थान पर शनिदेव की प्रतिमा की स्थापना की थी, और उनके समक्ष हनुमान जी की प्रतिमा भी स्थापित करवाई थी। सन् 1808 ई. में तत्कालीन शासक दौलतराव सिंधिया ने इस मंदिर को जागीर स्वरूप प्रदान किया था, जिसका प्रमाण मंदिर परिसर में स्थापित शिलालेख में मिलता है। यह मंदिर निर्जन वन क्षेत्र में स्थित होने के कारण इसकी आध्यात्मिक प्रभावशीलता और अधिक बढ़ जाती है। यह भी जनश्रुति है कि महाराष्ट्र स्थित प्रसिद्ध शनि शिंगणापुर में स्थापित शिला को यहीं से ले जाकर प्रतिष्ठित किया गया था। शनि मंदिर की विशेषताएँ मंदिर परिसर के समीप स्थित पौड़ी वाले हनुमान जी की प्रतिमा, जो भूमि में लेटी हुई अवस्था में है, अत्यंत अद्वितीय है।
सम्पूर्ण शनिश्चरा पर्वत एवं इसके आसपास का क्षेत्र ‘सिद्ध क्षेत्र’ के रूप में विख्यात है, जहाँ श्रद्धालु आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं। इस मंदिर की एक और अद्भुत विशेषता यह है कि पर्वत से गुप्त गंगा की सतत जलधारा प्रवाहित होती है। यहाँ की गुफाओं में प्राचीन समय में संत-महात्मा तपस्या करते थे, जिसके भौतिक प्रमाण आज भी विद्यमान हैं। मंदिर के भीतर स्थापित श्री राधाकृष्ण मंदिर का जीर्णोद्धार कर 6 जून 2011 को नई प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा की गई थी।
पर्यटन एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से महत्व शनि मंदिर के आसपास कई प्राचीन ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल स्थित हैं, जिनमें मुरली मनोहर मंदिर, बटेश्वर, पढ़ावली, मितावली, ककनमठ, तथा कुन्तलपुर प्रमुख हैं। ये स्थल ग्यारहवीं एवं नवमी शताब्दी के पुरातात्विक धरोहर हैं, जिन्हें धार्मिक और पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित किया जा रहा है। श्री शनिदेव – कल्याण एवं समृद्धि के दाता श्री शनिदेव को धर्म, न्याय, संयम, तप, एवं कर्म के प्रतीक देवता माना जाता है। उनकी कृपा से व्यक्ति को सुख-शांति, यश, वैभव, धन-संपत्ति एवं पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। आइए, हम सभी इस पावन तीर्थस्थल के दर्शन करें और इसके संरक्षण एवं विकास में अपना अमूल्य योगदान प्रदान करें।
मोनिका माहौर




