मनुष्य और पशु के बीच का रिश्ता हजारों वर्षों पुराना है। यह रिश्ता भरोसे, साथ और करुणा पर टिका था। पर आज हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ सड़क पर बैठे कुत्तों की आक्रामकता से लोग दहशत में हैं। आए दिन अख़बारों में खबरें छप रही हैं—“सड़क के कुत्तों ने मासूम पर हमला किया”, “बच्चे की जान गई”, “बुजुर्ग घायल हुआ”। ये घटनाएँ समाज को झकझोर रही हैं और सवाल उठ रहा है कि क्या कुत्ते वाकई अचानक खतरनाक हो गए हैं? या हम इंसान, अपनी नीतियों और बदलते व्यवहार से उन्हें इस स्थिति तक पहुँचा चुके हैं?
एक समय था, जब सड़क के कुत्ते हमारे जीवन का हिस्सा थे। घर की चौखट पर बची हुई रोटियों की खुशबू फैलती थी। महिलाएँ दाल-चपाती लेकर पुकारतीं, और ये बेज़ुबान प्राणी दौड़ते हुए आते। बच्चे इनके साथ खेलते, और ये कुत्ते बदले में घर की रखवाली करते। यह रिश्ता सिर्फ़ भोजन का नहीं, बल्कि अपनत्व का था। लेकिन धीरे-धीरे यह समीकरण बदल गया। जब से “स्वच्छ भारत अभियान” और आधुनिक अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था लागू हुई, तब से घरों का बचा हुआ खाना सीधे कचरा गाड़ियों में जाने लगा। रोटियों की खुशबू चौखट से गायब हो गई। नतीजा, सड़क पर रहने वाले कुत्तों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत खत्म हो गया। स्वच्छता का उद्देश्य निश्चित रूप से सराहनीय है। परंतु इस स्वच्छता ने केवल कचरे को नहीं हटाया—इसने करुणा और इंसानियत को भी कहीं हाशिये पर धकेल दिया।
भूख की आग: आक्रामकता की जड़ में छिपी सच्चाई
भूख एक ऐसी शक्ति है, जो सभ्यता के सारे नियम तोड़ देती है। इतिहास गवाह है कि अकाल के समय इंसान ने भी इंसानियत छोड़ दी। तो क्या हम उम्मीद करें कि एक जानवर भूख से तड़पते हुए शांत और विनम्र बना रहेगा? जब भोजन का कोई साधन न बचे, तो आक्रामकता स्वाभाविक है। सड़क के कुत्ते आज जिस व्यवहार के लिए बदनाम हो रहे हैं, उसकी असली वजह उनकी प्रकृति नहीं, बल्कि हमारी उपेक्षा है।
हम कहते हैं—कुत्ते खतरनाक हो गए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि हमने उनकी प्लेट से आखिरी रोटी भी छीन ली है। हमने उनसे दोस्ती का रिश्ता तोड़ा, और उसकी जगह डर और अविश्वास का बीज बो दिया। हम आधुनिकता और स्वच्छता की दौड़ में इतनी तेज़ भागे कि पीछे छूट गई हमारी संवेदनशीलता। कभी धर्म, कभी राजनीति, कभी विकास के नाम पर हमने बड़ी-बड़ी बातें कीं, लेकिन उन बेज़ुबान प्राणियों के लिए एक कटोरी पानी, एक रोटी तक नहीं छोड़ पाए। प्रश्न यह है कि क्या हमने कचरे के साथ-साथ करुणा को भी कचरे के डिब्बे में डाल दिया है?
समस्या का हल: कठिन नहीं, बस नीयत चाहिए
हमारे पास समाधान है, पर ज़रूरत है नीयत की। कुछ छोटे, लेकिन प्रभावी कदम इस समस्या को बड़ी हद तक खत्म कर सकते हैं। सामुदायिक फूड बाउल पॉइंट बनाने के लिए हर मोहल्ले में एक निश्चित स्थान तय किया जाए, जहाँ लोग रोजाना बचा हुआ साफ-सुथरा भोजन रख सकें। यह सुनिश्चित करें कि यह व्यवस्था सुरक्षित और स्वच्छ तरीके से हो। जानवरों के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना होगा। गर्मी में सबसे बड़ी त्रासदी प्यास है। सड़क किनारे पानी के बर्तन रखना कोई बड़ा काम नहीं, लेकिन इससे कई जान बच सकती हैं।
इसके अलावा कुत्तों की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए अनिवार्य रूप से टीकाकरण और नसबंदी पर सरकारी तंत्र और स्वयं सेवी संस्थाओं को फोकस करना होगा। स्थानीय निकाय और पशु कल्याण संगठनों के सहयोग से नियमित टीकाकरण और नसबंदी कराई जाए। इससे न सिर्फ़ आक्रामकता कम होगी, बल्कि बीमारी का खतरा भी घटेगा। कुत्तों के प्रति प्रेम और स्नेह के लिए जनजागरूकता भी जरूरी है। लोगों को यह समझाना होगा कि जानवर हमारी भाषा नहीं समझते, लेकिन वे हमारी नीयत पढ़ लेते हैं। बच्चों को यह सिखाना होगा कि जानवरों को पत्थर मारना या चिढ़ाना गलत है। स्कूलों में “एनिमल फ्रेंडली” कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं।
हम गर्व करते हैं कि हम तकनीकी रूप से आगे बढ़ रहे हैं। पर क्या हम नैतिक रूप से भी उतने ही आगे हैं? करुणा सिर्फ एक भावना नहीं, यह सभ्यता की रीढ़ है। करुणा ही वह पुल है, जो इंसान और जानवर के बीच भरोसे की डोर को फिर से जोड़ सकता है। आज अगर हम उनके पेट तक एक रोटी पहुँचा दें, तो कल वही कुत्ते हमारे बच्चों के साथी, हमारे घरों के पहरेदार और समाज के दुलारे बन सकते हैं।
करुणा ही धर्म है। करुणा ही इंसानियत है और करुणा ही हमारी सभ्यता का असली चेहरा है। एक रोटी आज, एक दोस्ती हमेशा के लिए।
संगीता शर्मा (लेखिका राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य हैं)




