संघ प्रमुख मोहन भागवत के एक भाषण की इन दिनों बहुत चर्चा हो रही है और उसके अलग अलग निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। यह भाषण उन्होंने विगत दिनों संघ की दिवंगत विभूतियों में से एक स्व मोरोपंत पिंगले के व्यक्तित्व और कृतित्व की विशेषताओं को उजागर करने वाली पठनीय पुस्तक ‘ मोरोपंत पिंगले: द आर्किटेक्ट आफ हिंदू रिसर्जेंस’ के विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि की आसंदी से दिया था। मोहन भागवत ने अपने भाषण में मोरोपंत पिंगले के 75 वें जन्मदिन पर आयोजित सम्मान समारोह में उनके द्वारा विनोद के लहजे में की गई एक टिप्पणी का उल्लेख किया। मोरोपंत पिंगले ने अपने सम्मान के प्रत्युत्तर में दिए गए भाषण में कहा था कि जब आप किसी के 75 वें जन्मदिन पर शाल ओढ़ाकर उनका सम्मान करते हैं तो इसका मतलब होता है कि अब आप हट जाओ हमें करने दो। चूंकि संघ प्रमुख मोहन भागवत के बारे में यह आम धारणा बन चुकी है कि वे इशारों इशारों में ही अपना मंतव्य व्यक्त करते हैं इसलिए उनके इस भाषण ने भी यह बहस छेड़ दी है कि संघ प्रमुख ने मोरोपंत पिंगले की टिप्पणी का उल्लेख सहज होकर किया था या फिर उनका इशारा कहीं और था । संयोग से मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी साल सितंबर में एक सप्ताह के अंतराल से 75 वर्ष के हो रहे हैं। इसलिए संघ प्रमुख के बयान के निहितार्थ निकाले जाने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है।
मोहन भागवत ने अपने भाषण में यद्यपि मोरोपंत पिंगले की टिप्पणी का उल्लेख करके उनकी विनोद प्रियता का उदाहरण मात्र दिया था परन्तु विपक्ष तो जैसे इसी अवसर की तलाश कर रहा था। उसने मोहन भागवत के भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए नसीहत खोजने में कोई देर नहीं की जबकि उसमें ऐसा कोई भाव नहीं था। मैं समझता हूं कि मजाकिया लहजे में कही गई की बात को मजाक में ही लिया जाना चाहिए। चूंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगामी 17 सितंबर को अपने यशस्वी जीवन के75 वर्ष पूर्ण करने जा रहे हैं इसलिए यह तो तय माना जाना चाहिये कि मोहन भागवत का उक्त भाषण पर छिड़ी बहस का सिलसिला निकट भविष्य में थमने वाला नहीं है बल्कि अगले कुछ दिनों में यह मसला और जोर जोर से उठाया जाएगा। वैसे संघ प्रमुख मोहन भागवत खुद भी मोदी की 75 वीं वर्षगांठ के 6 दिन पूर्व 75 वर्ष के होने जा रहे हैं इसलिए यह कयास भी लगाए जा सकते हैं कि क्या संघ प्रमुख मोहन भागवत भी मोरोपंत पिंगले के मजाक को हकीकत में बदलने का मन तो नहीं बना रहे हैं लेकिन सवाल तो फिर वही उठता है कि क्या स्व मोरोपंत पिंगले द्वारा अपने 75 वीं वर्षगांठ के अवसर आयोजित सम्मान समारोह के प्रत्युत्तर में विनोद प्रियता के लहजे में कही गई बात को उसी रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
मेरे विचार से तो राजनीति से सन्यास के लिए 75 साल की सीमा रेखा तय करने की बात सैद्धांतिक रूप से तो सही मानी जा सकती है परन्तु व्यवहारिक रूप से भी इसे सही ठहराना उचित नहीं होगा। अगर 75 पार के राजनेता अथवा संघ के पदाधिकारी अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करने में पूर्णतः सक्षम हैं तो निश्चित रूप से उनकी सेवाओं का उपयोग किया जाना चाहिए। ऐसी तपस्वी,मनस्वी और अनुभवी विभूतियां चाहे सरकार अथवा किसी भी राजनीतिक दल में वरिष्ठ पदों पर आसीन हों उन्हें शाल ओढ़ाकर उनसे वानप्रस्थ आश्रम में जाकर विश्राम करने का अनुरोध करना उनकी अनमोल सेवाओं का उचित सम्मान नहीं माना जा सकता। ऐसा मानना भी उचित नहीं होगा कि 75 साल की आयु सीमा पार कर चुके राजनेता अथवा संघ के पदाधिकारी अपने से किसी प्रतिभाशाली कनिष्ठ की उन्नति के मार्ग में अवरोध पैदा करने की मंशा रखते होंगे। भाजपा और संघ में युवा प्रतिभाओं का हमेशा सम्मान किया गया है और यह सिलसिला निरंतर जारी है अतः संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्व. मोरोपंत पिंगले से जुड़ी जिस घटना का उल्लेख विगत दिनों एक पुस्तक के विमोचन समारोह में किया है उसका उनकी विनोद प्रियता के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

कृष्णमोहन झा
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)




