चीन अपनी विस्तारवादी नीति और कोरोना जैसा प्राणघातक वायरस देकर पूरी दुनिया को संकट में डालने वाले इस देश का तानाशाही रवैया एवं इसकी कलंक कथाओं की सूची बहुत लंबी रही है। चीन ने आज से 36 साल पहले हजारों निहत्थे छात्रों के आंदोलन को कुचलने के लिए उनके ऊपर टैंक चढ़वा दिए थे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इशारे पर पीएलए की इस कार्रवाई में 10 हजार से ज्यादा छात्रों की मौत हो गई थी। ये छात्र पेइचिंग के थियानमेन चौक पर 4 जून 1989 में लोकतंत्र बहाली के समर्थन में इकट्ठा हुए थे। करीब चार साल पहले सार्वजनिक हुए ब्रिटिश खुफिया राजनयिक दस्तावेज में इस घटना के पल-पल का उल्लेख किया गया है। दरअसल चीन में मीडिया के ऊपर लगे कड़े सेंसरशिप के कारण आज भी उस घटना से जुड़े कई अहम जानकारियां उपलब्ध नहीं हैं। चीन की सरकारी मीडिया कम्युनिस्ट पार्टी के आदेश पर केवल वही बातें ही बताती हैं जो उनके अपने फायदे की होती हैं। 4 जून के दिन चीन ही नहीं, बल्कि हॉन्ग कॉन्ग, ताइवान, अमेरिका समेत पूरी दुनिया में थियानमैन चौक के नरसंहार में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
4 जून 1989 को बीजिंग के थियानमेन चौक पर हजारों छात्र इकट्ठा हुए। ये छात्र अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए लोकतांत्रिक तरीके से माँग कर रहे थे। लेकिन चीनी सरकार ने इन छात्रों की माँग को अनसुना कर दिया। निहत्थे युवाओं की इस भीड़ पर टैंकों और बंदूकों से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी गई। देखते ही देखते चीनी युवाओं की लाशें बिछ गईं। थोड़ी ही देर में कम से कम 10 हजार छात्र काल के गाल में समा गए। आज़ादी के खिलाफ इतना बड़ा दमन दुनिया ने पहली बार देखा और इस तरह चीनी सरकार ने लोकतंत्र की आत्मा को पूरी तरह से कुचल दिया।
चीन के थियानमेन चौक पर मासूम और निर्दोष छात्र अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्ण अहिंसक प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए थे लेकिन चीन की तानाशाह कम्युनिस्ट सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए भीषण नरसंहार किया जिसमें सैकड़ों नागरिकों की जान चली गई। चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने छात्र आंदोलन को कवर करने वाले चीनी पत्रकारों को उनके पद से हटा दिया और विदेशी पत्रकारों को चीन से निकाल दिया।
चीन के तत्कालीन ब्रिटिश राजदूत एलन डोनाल्ड ने लंदन भेजे गए एक टेलीग्राम में कहा था, कम से कम 10,000 आम नागरिक मारे गए हैं, जबकि चीन ने ये संख्या महज 200 बताकर दुनिया की आँख में धूल झोंकने की कोशिश की थी और इस तरह चीन के लोगों को वहां की सरकार ने टैंक और बंदूक की नोंक पर लंबे समय के लिए खामोश कर दिया। इतना ही नहीं, चीन ने ये सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश की, दुनिया में कहीं भी इस नरसंहार के वीडियो, या चित्र प्रकाशित ना हों। मीडिया पर चीनी कम्युनिस्ट सरकार के ये आदेश अभिव्यक्ति की आजादी पर सबसे बड़े हमले के रूप में देखे गए।
इस घटना के तीन दशक बाद भी थियानमैन चौक का खौफ अब तक लोगों के लिए दिल और दिमाग से उतरा नही है। यहां ये भी जानना आवश्यक है कि चीन में लोकतंत्र सेनानियों की हत्या के बारे में खुले तौर पर चर्चा करना इस देश में अभी भी पूरी तौर पर प्रतिबंधित है। जाहिर है, चीन की सरकार अपने नागरिकों को भले और सुविधाएँ दे सकती हो लेकिन उन्हें उड़ने की आज़ादी नहीं दे सकती। उन्हें लोकत्रांत्रिक अधिकार नहीं दे सकती। शायद यही बात चीन के लोगों की अब नियति बन चुकी है। लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच चीन को तय करना है, कि उन्हें कम्युस्टि, अलोकतांत्रिक चीन चाहिए, या फिर कंफ्यूशियस या भगवान बुद्ध का चीन चाहिए।
केवल भारत ही नहीं दुनिया का इतिहास साक्षी है कि वामपंथी विचारधारा ने जिस भी देश को छुआ, उसे राजनीतिक रूप से ही लाल नहीं किया, बल्कि वहां की सामाजिक- सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को भी लाल कर दिया। तथाकथित अहिंसक बोल्शेविक क्रांति के बाद का रूसी इतिहास, वास्तव में शवों एवं कब्रिस्तानों का इतिहास रहा है। वहां 3 वर्षों तक रूस में गृह युद्ध चलता रहा उस समय साम्यवाद का विरोध करने वालों से निपटने के लिए लेनिन ने रेड-आर्मी और कुख्यात एवं क्रूर खूफिया पुलिस ‘चेका’ का गठन किया था लेनिन ने सभी “क्रांति विरोधियों” को गोली मार देने के निर्देश जारी किए। लाखों लोगों को यातनाएं देकर मौत के घाट उतार दिया गया।
पूरी दुनिया ने वामपंथी बुद्धजीवियों, उनके नेता और लाल सलाम को इसलिए नकार दिया है कि उनकी सारी राजनीति और विचार सिर्फ हिंसा, अत्याचार की बुनियाद पर टिके हुए हैं और कोई भी संप्रभु राष्ट्र हिंसा के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ सकता है कम्युनिस्टों का इतिहास यही रहा है। क्योंकि कम्युनिस्ट मानवता विरोधी रहे हैं। ये तानाशाह हैं, आराजक हैं। अत्याचारी और उत्पीड़क हैं। ये अहिंसक नहीं, हिंसक हैं। इनके विचार हिंसा को बढ़ावा देते हैं।
इतिहास को जब हम पढ़ते हैं तो पता चलता है कि वामपंथ का दोहरा चरित्र ना केवल उजागर हो चुका है बल्कि अनेक पुस्तकों में लिखा जा चुका है। कम्युनिस्ट जहां सत्ता से बाहर होते हैं, वहां वो लोकतंत्र की मांग भी करते हैं, फ्रीडम ऑफ स्पीच की बात करते हैं। वामपंथ वहां सर्वहारा का सिपाही बना हुआ दिखता है, वहां वो मानवाधिकारों की वकालत करता है, मजदूरों एक हो जाओ का नारा देता है लेकिन जहां वो सत्ता में होता है,वहां ये सारी बातें ताक पर रख देता है, उसके लिए ये सारी बातें बेईमानी सी लगने लगती हैं।
3 दशक बाद भी चीन के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। थियानमेन चौक के वक्त भी चीन में मानवाधिकारों की बात पूरी तरह बेईमानी थी और कोरोना वायरस के इस वक्त भी। चीन और कम्युनिस्टों के लिए मानवाधिकारों की बात करना सिर्फ दिखावा ही अब तक साबित हुआ है। थियानमैन चौक के वक्त भी फ्रीडम ऑफ स्पीच का दावा पूरी तरह दिखावा था और कोरोना वाइरस के वक्त भी ये सिर्फ दिखावा भर है। 3 दशकों के बाद भी थियानमैन चौक से निर्दोष छात्रों का लहू चीन से हिसाब मांग रहा है वहीं चाइनीज वायरस को लेकर पूरी मानवजाति अभी भी संकट के घेरे में है और पूरी दुनिया ने कोरोना वायरस को लेकर भी चीन से प्रश्न पूछ रहा है। कोई देश कोई वामपंथी विचार वाली सरकार इतनी निरंकुश और ह्दय शून्य कैसे हो सकती है ?

बृजेश कुमार द्विवेदी (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
नोट – आलेख में व्यक्त किए गए विचार उनके अपने हैं। संस्थान इसकी वैचारिक पुष्टि नहीं करता है।




