मैंने गुमनाम नायक वीर सावरकर की असली गाथा बताने का बीड़ा उठाया – रणदीप हुड्डा

नई दिल्ली : शुक्रवार, नवम्बर 22, 2024/ स्वातंत्र्य वीर सावरकर की जीवनी पर आधारित फिल्म बनाने वाली टीम ने 55वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में मीडिया से बातचीत की । फिल्म को भारतीय पैनोरमा खंड की शुरुआती फीचर के रूप में प्रदर्शित किया गया। इस कार्यक्रम में फिल्म की रचनात्मक यात्रा और इसके ऐतिहासिक महत्व पर विचार करने के लिए एक मंच प्रदान किया गया।

विनायक दामोदर सावरकर की मुख्य भूमिका निभाने वाले और फिल्म के निर्देशक रणदीप हुड्डा ने फिल्म निर्माण की चुनौतियों की तुलना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वीर सावरकर द्वारा सामना किए गए संघर्षों से की। मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें गुमनाम नायक वीर सावरकर की वास्तविक गाथा को सार्वजनिक चर्चा में लाने का बीड़ा उठाना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा, “सावरकर हमेशा भारत को सैन्य रूप से सशक्त देखना चाहते थे। आज, विश्व में हमारे प्रभाव में काफी सुधार हुआ है। यह फिल्म सशस्त्र संघर्ष के एक और पहलू को उजागर करती है, जिसमें दिखाया गया है कि कैसे इसने क्रांतिकारियों को स्वतंत्रता के लिए हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया”।

फिल्म में भीकाजी कामा की भूमिका निभा रहीं अभिनेत्री अंजलि हुड्डा ने बताया कि फिल्म में उनकी भूमिका ने सावरकर के निजी जीवन के बारे में उनकी समझ को और बढ़ाया। उन्होंने कहा, “यह फिल्म मेरे लिए आंख खोलने वाली थी। मुझे उम्मीद है कि भविष्य में हमारे भूले-बिसरे नायकों पर ऐसी और फिल्में बनाई जाएंगी।”

प्रेस कॉन्फ्रेंस में जय पटेल, मृणाल दत्त और अमित सियाल भी शामिल हुए। उन्होंने अपने अनुभव साझा किए और भारतीय सिनेमा में ऐसी फिल्मों के महत्व पर प्रकाश डाला।

यह फिल्म भारत की स्वतंत्रता के कई अनकहे नायकों में से एक वीर सावरकर की गुमनाम गाथा को सामने लाती है यह मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उनके द्वारा झेले गए भयानक परिणामों को उजागर करती है।

यह फिल्म क्रांतिकारी विचारक और कवि विनायक दामोदर सावरकर के जीवन को दर्शाती है, जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी। यह सशस्त्र प्रतिरोध के कट्टर समर्थक के रूप में उनके बदलाव, उनके वैचारिक संघर्षों और सेलुलर जेल में उनके कारावास के वर्षों को दर्शाती है। व्यक्तिगत बलिदानों और रणनीतिक नेतृत्व के माध्यम से, सावरकर एक जटिल व्यक्ति के रूप में उभरे हैं, जिनका एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का सपना आज भी गूंजता रहता है।

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