भारतीय समाज में मनु और उनकी स्मृति को लेकर जो बहसें चली आ रही हैं, वे आज भी हमारे बौद्धिक विमर्श को उद्वेलित कर देती हैं। विडंबना यह है कि इन बहसों का बड़ा हिस्सा तथ्यों पर नहीं, बल्कि पूर्वाग्रहों और राजनीतिक स्वार्थों पर आधारित है। बीते दिनों कर्नाटक उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि मनुस्मृति को लेकर जो विकृत धारणाएँ समाज में फैलाई जाती रही हैं, वे वास्तविकता से मेल नहीं खातीं। इस निर्णय ने उन सभी लोगों को एक सशक्त संदेश दिया है, जो मनु पर मनुवाद का आरोप लगाकर भारत की एक बड़ी जनसंख्या को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करते रहे हैं। अब समय आ गया है कि इस विमर्श को तथ्यों और शोध की कसौटी पर परखा जाए और समझा जाए कि मनु ने वास्तव में मानव मात्र और राज्य के कल्याण की ही परिकल्पना की थी।
मनु और मनुस्मृति का सामाजिक परिप्रेक्ष्य
मनुस्मृति को प्रायः स्मृतियों में सबसे प्राचीन और व्यापक माना गया है। इसे मनु द्वारा रचित माना जाता है, जिन्होंने भारतीय समाज के संगठन और शासन के लिए कुछ मूलभूत सिद्धांत प्रस्तुत किए। इसमें धर्म, राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक आचरण तक के विविध आयाम मिलते हैं। किंतु समस्या तब उत्पन्न हुई जब इस ग्रंथ के अनेक अंशों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया और मनु को जातिवाद और सामाजिक असमानता का प्रवर्तक बताने का अभियान चलाया गया।
वास्तव में मनुस्मृति का बड़ा हिस्सा राजनीति, शासन और राज्य के कल्याण से संबंधित है। उदाहरण के लिए, मनु कहते हैं कि राजा का पहला दायित्व है कि वह प्रजा की रक्षा करे, क्योंकि राज्य तभी टिक सकता है जब प्रजा सुखी हो। “राजा धर्म से विमुख होकर यदि प्रजा को कष्ट देता है तो वह राज्य के पतन का कारण बनता है” (मनुस्मृति, अध्याय 7, श्लोक 20)।
कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय और उसका संदेश
वस्तुत: मामला यह था कि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 19 वर्षीय अनुसूचित जाति की महिला के बलात्कार में सहायता करने वाले सैयद फरवेज मुशर्रफ को जमानत देने से इनकार कर दिया और अपराध को बढ़ावा देने के लिए उनकी भूमिका की निंदा की। पीठ ने मनुस्मृति और महात्मा गांधी के आदर्शों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि समाज महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा का उल्लंघन करने वाले कृत्यों को माफ नहीं कर सकता। अपने फैसले में, न्यायमूर्ति रचैया ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा, “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता, यत्रैतास्तु पूज्यन्ते सर्वाष्टात्रफलाः क्रियाः” – अर्थात् “जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं; जहाँ स्त्रियों का अपमान होता है, वहाँ सभी कर्म निष्फल होते हैं।”
कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह हालिया निर्णय बताता है कि मनुस्मृति को केवल जातिगत भेदभाव का ग्रंथ मानना भ्रांतिपूर्ण है। न्यायालय ने जिस तरह से मनु स्मृति को कोट किया, उससे स्पष्ट होता है कि इसे बार-बार गलत ढंग से उद्धृत कर समाज में वैमनस्य फैलाने का काम किया गया। निश्चित ही किसी ग्रंथ को समझने के लिए उसकी भाषा, काल और सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखना अनिवार्य है।
वस्तुत: यह निर्णय उन सभी समूहों के लिए सबक है जो वर्षों से मनुस्मृति को हिन्दू समाज पर आरोप-प्रत्यारोप के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। यदि भाषा-विशेषज्ञों और विद्वानों की मानें तो जो कठोर अंश बार-बार उद्धृत किए जाते हैं, वे बाद की प्रविष्टियाँ हो सकती हैं। मूल पाठ का हिस्सा नहीं। संस्कृत के आचार्य हरप्रसाद शास्त्री और पं. भवानीशंकर शर्मा ने यह स्थापित किया था कि “मनुस्मृति का मूल पाठ नीतिपरक और कल्याणकारी है, उसमें कठोरता बाद के शिल्पकारों द्वारा जोड़ी गई प्रतीत होती है” (भवानीशंकर शर्मा, मनुस्मृति का पुनर्पाठ, वाराणसी, 1962, पृ. 58)।
गांधी और मनुस्मृति : एक अध्ययन
महात्मा गांधी का दृष्टिकोण भी उल्लेखनीय है। उन्होंने स्वीकार किया कि मनुस्मृति में कई बातें ऐसी हैं जिनसे असहमति हो सकती है, किंतु साथ ही उन्होंने कहा कि “मनु ने जहाँ-जहाँ मानव और समाज के कल्याण की बात कही है, वे आज भी अनुकरणीय हैं” (यंग इंडिया, 1921, अंक 12)। गांधी इस बात पर जोर देते थे कि किसी भी प्राचीन ग्रंथ को उसके समग्र परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह विचार न्यायालय के निर्णय से भी मेल खाता है।
नफरत की राजनीति और मनुवाद का आरोप
आज के राजनीतिक विमर्श में “मनुवाद” शब्द का उपयोग एक गाली की तरह किया जाने लगा है। कई दल और विचारधाराएँ इसे एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करती हैं ताकि हिन्दू समाज के भीतर वैमनस्य फैलाया जा सके। यह आरोप लगाया जाता है कि मनु ने स्त्रियों और शूद्रों को दबाने का कार्य किया। किंतु जो लोग यह कहते हैं, वे जानबूझकर उन श्लोकों को नज़रअंदाज कर देते हैं जहाँ स्त्रियों को पूजनीय बताया गया है; “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” (मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 56)। यदि देवताओं के निवास का आधार स्त्रियों का सम्मान है, तो क्या इसे स्त्री-विरोधी कहा जा सकता है?
इसी तरह, मनु ने यह भी कहा कि सभी वर्ण धर्म पालन के लिए हैं, किसी को केवल जन्म के आधार पर उच्च या नीच नहीं माना जा सकता। संस्कृत के विद्वान पं. राजेश्वर शास्त्री द्रविड़ ने स्पष्ट किया है कि मनुस्मृति की “वर्ण” संकल्पना कर्म और गुण पर आधारित है, न कि जातिगत जन्म पर (राजेश्वर शास्त्री द्रविड़, वर्ण और जाति, दिल्ली, 1955, पृ. 102)।
भाषा और पाठ-प्रक्षेप का प्रश्न
भाषाविदों का यह मानना है कि मनुस्मृति का मूल स्वरूप समय के साथ बदलता गया। विभिन्न कालखंडों में राजनीतिक और सामाजिक कारणों से इसमें प्रक्षेप हुए। यही कारण है कि एक ही श्लोक के कई संस्करण अलग-अलग पांडुलिपियों में मिलते हैं। पं. पांडुरंग वामन काणे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक धर्मशास्त्र का इतिहास में लिखा है, “मनुस्मृति के कई अंश ऐसे हैं जिनकी भाषा और शैली मूल पाठ से मेल नहीं खाती, इससे यह प्रमाणित होता है कि वे बाद में जोड़े गए” (काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, खंड 2, बंबई, 1941, पृ. 311)।
यदि ऐसा है, तो यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि मनु को जातिवादी ठहराना ऐतिहासिक अन्याय है। यह न्यायालय के निर्णय के अनुरूप ही है, जिसमें कहा गया कि किसी ग्रंथ का मूल्यांकन उसके अपभ्रंश रूप पर नहीं किया जा सकता।
पश्चिमी दृष्टिकोण और भारतीय परंपरा
पश्चिमी दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने भी भारतीय ग्रंथों पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि “मनु के नियमों में जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टि मिलती है, जो यूरोपीय बाइबल की कठोरता से भिन्न है” (Nietzsche, Twilight of the Idols, 1889, “The Problem of Socrates”)। यदि पश्चिम का एक दार्शनिक भी मनुस्मृति को जीवन-उत्सव का ग्रंथ मान सकता है, तो हमारे अपने समाज में इसे केवल जातिवाद का प्रतीक बताना बौद्धिक बेईमानी ही कही जाएगी।
मनु स्मृति की समकालीन प्रासंगिकता
आज भारत जिस लोकतांत्रिक ढांचे में आगे बढ़ रहा है, वहां भी मनु की कई बातें संदर्भोचित हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने कराधान के लिए कहा था कि राजा को प्रजा पर वैसा ही कर लगाना चाहिए जैसे मधुमक्खी फूलों से रस लेती है, “नातिपीडया प्रजा: करोतु” (मनुस्मृति, अध्याय 7, श्लोक 130)। क्या यह आज की कर व्यवस्था का एक आदर्श सिद्धांत नहीं हो सकता?
मनु ने शासन में न्याय और पारदर्शिता को सर्वोपरि माना। उनका मानना था कि राजा यदि पक्षपात करेगा तो राज्य कभी भी स्थिर नहीं रह सकता। यह विचार आधुनिक संविधानवाद और न्यायपालिका की निष्पक्षता के सिद्धांत से मेल खाता है।
नए विमर्श की आवश्यकता
वस्तुत: कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय आज केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं मानी जानी चाहिए है, इसमें भारतीय समाज के लिए एक वैचारिक संदेश भी है। यह बताता है कि मनु को गलत ढंग से प्रस्तुत कर समाज को विभाजित करने का जो खेल लंबे समय से चल रहा है, वह अब खत्म होना चाहिए। जो लोग “मनुवाद” का आरोप लगाकर देश की एक बड़ी आबादी को अपराधबोध में धकेलते हैं, उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि मनुस्मृति में मानव और राज्य के कल्याण की ही कल्पना की गई थी।
सच्चाई यह है कि मनु महाराज ने मानव मात्र का कल्याण चाहा। उन्होंने राज्य को न्यायपूर्ण, प्रजा को सुखी और समाज को व्यवस्थित रखने का मार्ग दिखाया। इसलिए यह समय है कि हम इस विमर्श को आरोप-प्रत्यारोप से बाहर निकालकर शोध और तथ्यों के आधार पर देखें। तभी समाज में जो भ्रम फैलाया जा रहा है, वह रुकेगा और भारतीय परंपरा की वास्तविक छवि सामने आएगी।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




