राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान अक्सर देश में एक नई बहस को जन्म देते हैं लेकिन कई बार यह भी देखने में आता है कि वे जब व्यापक राष्ट्रीय हित से जुड़े किसी महत्वपूर्ण विषय पर अपनी राय व्यक्त करते है तब उस पर सार्थक विमर्श का हिस्सा बनने के बजाय संघ के प्रति पूर्वाग्रही वर्ग उसे एकदम खारिज करने की कोशिशों में जुट जाता है। यह कोई नई बात नहीं है। यह सिलसिला एक लंबे अरसे से चला आ रहा है लेकिन हर बार संघ प्रमुख की महत्वपूर्ण राय पर सार्थक बहस के अंत में यही निष्कर्ष निकलता है कि राष्ट्रीय हित से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर संघ प्रमुख की राय की न तो अनदेखी की जानी चाहिए,न ही उस पर पूर्वाग्रही दृष्टि कोण अपनाया जाना चाहिए।
ताज़ा मामला संघ प्रमुख के द्वारा दिए गए उस बयान से जुड़ा है जिसमें उन्होंने देश की प्रजनन दर में गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए हर दम्पत्ति को तीन बच्चों को जन्म देने की सलाह दी है । संघ प्रमुख के इस बयान पर भी टीका टिप्पणी का सिलसिला प्रारंभ हो गया है परन्तु चिंताजनक रूप से गिरती हुई प्रजनन दर और उसके प्रभावों पर विचार करें तो संघ प्रमुख की राय की सार्थकता पर सवाल उठना मुश्किल प्रतीत होता है। गौरतलब है कि अतीत में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भी इसी तरह की राय व्यक्त कर चुके हैं। कुछ दिन पहले आंध्र प्रदेश सरकार टू चाइल्ड पालिसी भी वापस ले ली थी जिसके तहत दो से अधिक संतानों के माता-पिता पिता को स्थानीय चुनाव में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 2005 में तत्कालीन सरसंघचालक सुदर्शन ने भी कहा था कि दो या एक बच्चे के नियम में नहीं फंसना चाहिए । उनके कथन का आशय था कि हर दम्पत्ति को कम से कम तीन बच्चों को जन्म देना चाहिए।
मोहन भागवत गत दिनों नागपुर में आयोजित कुठाले कुल सम्मेलन को संबोधित करते हुए जब यह कह रहे थे कि देश में हर दम्पत्ति को तीन बच्चों को जन्म देना चाहिए तब वे भली भांति यह भी जानते थे कि उनकी इस सलाह की टीका टिप्पणी अवश्य होगी इसलिए उन्होंने यह भी बताया कि उनकी इस सलाह का आधार क्या है। भागवत ने कहा कि जब किसी समाज की जनसंख्या दर 2.1 से नीचे चली जाती है तब वह समाज नष्ट हो जाता है । जनसंख्या दर नीचे चली जाने से , कोई संकट न होने के बावजूद वह समाज नष्ट हो जाता है। बहुत से समाज और भाषाएं इसीलिए विलुप्त हो गए। इसलिए जनसंख्या दर को 2.1 बनाए रखने के लिए तीन बच्चे पैदा करना चाहिए।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि 1998 या 2002में हमारे देश की जो जनसंख्या नीति तय की गई थी उसमें यह कहा गया था कि जनसंख्या दर 2.1 से कम नहीं होना चाहिए इस दर में को बनाए रखने के लिए हर दम्पत्ति के दो से अधिक बच्चे होने की आवश्यकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मोहन भागवत की इस सलाह पर राजनीति भी गर्मा गई है। कुछ राजनीतिक दल इसके विरोध में मुखर हो उठे हैं तो कुछ दलों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करना ही उचित समझा है। दरअसल देश की जनसंख्या दर में गिरावट पर मोहन भागवत की चिंता को एकदम खारिज करने से पहले यह सोचने की भी आवश्यकता है कि जनसंख्या दर में गिरावट के और क्या परिणाम हो सकते हैं। जनसंख्या दर में गिरावट के इस परिणाम के बारे में तो मोहन भागवत ने सचेत कर ही दिया है कि जिस समाज में जनसंख्या दर 2.1 से नीचे चली जाती है वह समाज विलुप्त हो जाता है। अगर चीन जर्मनी और जापान जैसे देशों के उदाहरण से समझें तो ज्ञात होगा कि वहां जनसंख्या दर घटने से वर्किंग पापुलेशन तेजी से घट रही है और बुजुर्गो की आबादी बढ़ रही है। इसी कारण चीन और सिंगापुर जैसे देशों ने अपनी जनसंख्या नीति में बदलाव करने का फैसला किया है। अब जब भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर है तब हमें भी अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अधिक से अधिक युवा आबादी की जरूरत होगी। किसी भी देश की प्रगति में युवा शक्ति का महत्व पूर्ण योगदान होता है। संघ प्रमुख मोहन भागवत की सलाह में भी यही संदेश छुपा हुआ है इसलिए उनकी सलाह पर अनावश्यक टीका टिप्पणी के बजाय उस पर गंभीरता से चिंतन होना चाहिए।

कृष्णमोहन झा
नोट – लेखक राजनैतिक विश्लेषक है।




