गणेशोत्सव : सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संदेश

गणेश चतुर्थी का महा उत्सव शुरू होते ही चारों और उत्साह का वातावरण देखने को मिल रहा है। झांकियों के बड़े-बड़े पंडाल सजाए जा रहे हैं। जाहिर है चतुर्थी के दिन गणपति बप्पा पधार रहे हैं। झांकियां में तो उनके दर्शन होंगे ही, व्यक्तिगत स्तर पर घरों में भी इनकी स्थापना होने जा रही है। जैसा कि पहले से ही सब जानते हैं यह उत्सव क्रमशः डोल ग्यारस और अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है।

मान्यता है कि गणपति बप्पा की छोटी मूर्तियां जो घरों में स्थापित की जाती हैं, उनका विसर्जन डोल ग्यारस के दिन हो जाना चाहिए। जबकि झांकियां में स्थापित बड़ी मूर्तियों को अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जित किए जाने का प्रावधान है। छोटे बड़े शहरों और महानगरों में ऐसा देखने को भी मिलता है उदाहरण के लिए महाराष्ट्र का गणेश उत्सव प्रमुख है। वहां भी छोटे गणपति डोल ग्यारस को और बड़े गणपति अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जित किए जाते हैं। मुंबई में तो अनंत चतुर्दशी के दिन जब बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं समुद्र की ओर प्रस्थान करती हैं, तब दृश्य देखने योग्य होता है। चारों ओर लाखों दर्शनार्थियों की भीड़ होती है, जिसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा विशेष इंतजाम किए जाते हैं। इन दृश्यों को निहारने के लिए केवल भारत से ही नहीं विदेशों से भी पर्यटक आते हैं और इन सुंदर फलों को अपने कमरे में कैद कर लेते हैं।

अब बात करते हैं गणेश जी को समर्पित यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है। सर्व विदित है कि गणेश चतुर्थी दर असल गणपति बप्पा का जन्मदिन ही है। उनके जन्म को लेकर अनेक कथाएं प्रचलन में हैं। कुछ लोग उन्हें केवल और केवल माता पार्वती का पुत्र बताते हैं। जिनका शीश शंकर जी द्वारा काटे जाने पर उन्हें हाथी का सिर लगाकर पुनः जीवित किया गया। एक कथा यह भी प्रचलन में है कि जब गणेश जी के जन्म के बाद समस्त देवता उन्हें देखने आ रहे थे, तब शनिदेव भी वहां पहुंचे। लेकिन उन्होंने गणेश जी के दर्शन नहीं किये। माता पार्वती के बार-बार आग्रह किये जाने पर आखिर उन्होंने गणपति बप्पा पर अपनी दृष्टि डाल दी। बताया जाता है कि उनकी दृष्टि पड़ते ही गणेश भगवान का सिर धड़ से अलग हो गया। बाद में हाथी का शीश लगाकर गणेश जी को पुनर्जीवित किया गया। इस घटना से माता पार्वती बेहद गुस्सा हुईं और विकराल रूप धारण कर सृष्टि का संहार करने निकल पड़ीं । तब श्रेष्ठ देवगण विष्णु जी, ब्रह्मा जी और शंकर जी ने उनका गुस्सा यह कहकर शांत किया कि आज से गणेश जी गजानन के रूप में जाने जाएंगे और उन्हें समस्त देवताओं से पहले पूजा जाएगा। यहां तक कि माता सरस्वती और दूसरों द्वारा यह आश्वस्त किया गया कि गणेश जी सदैव हमारे साथ सुशोभित रहेंगे और जहां-जहां हमारा पूजन होगा वहां गणेश जी को भी आवश्यक रूप से पूजा जाएगा। गणेश जी अपनी विशिष्ट आकृति के लिए भी जाने जाते हैं। उनके कान बड़े हैं जो सीख देते हैं कि हमें सब की बात सुनने का बड़प्पन रखना चाहिए। जबकि बड़ा पेट यह दर्शाता है कि हमारा हाजमा केवल खाने को पचाने के मामले में ही नहीं, बल्कि अपनी आलोचना, निंदा और निंदनीय बातों को पचाने में भी सक्षम होना चाहिए। हाथों में दिखाई देने वाला अंकुश यह स्पष्ट करता है कि हमें समाज शासन तथा अथवा विधि द्वारा नियंत्रित किया जाए इससे अच्छा है कि हम स्वयं आत्म नियंत्रित हो और समाज में बेहतर आदर्श स्थापित करें। गजानन भगवान की लंबी सूंड संवेदनशील होने की ओर संकेत करती है और बताती है कि गंभीर व्यक्ति को आसपास के वातावरण को सूंघते चाहिए। इससे आने वाली विपत्तियों का नाश करने अथवा उनका सामना करने का वातावरण निर्मित होता है। गणेश जी की विशाल काया के मुकाबले उनके वाहन चूहा काफी छोटा है। यह संभवतः शिक्षा देता है कि हमारे संसाधन कितने भी छोटे और सीमित हों, हमें उनसे व्यापक परिणाम प्राप्त करने हेतु समर्थ होना आवश्यक है।

अनेक गुण हैं गणपति बप्पा में । क्योंकि शुभ लाभ के पिता है और रिद्धि सिद्धि के पतिदेव, इसलिए उन्हें सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला इष्ट देव भी माना गया है। ऐसी ढेर सारे कारण हैं जिनके चलते देवतागणों में गणेश जी का विशिष्ट स्थान है। यही कारण है कि शुभ प्रसंग में चाहे वह जन्म संबंधी समारोह हो या फिर शादी विवाह का माहौल, हर जगह पर पहले पूजा गणेश जी की ही होती है। यहां तक कि परिवार और सामाजिक स्तर पर आयोजित होने वाले धार्मिक आयोजन का पहला निमंत्रण प्रथम पूज्य गणेश जी महाराज को ही समर्पित किया जाता है।

डॉ. राघवेंद्र शर्मा (लेखक-स्‍वतंत्र पत्रकार है)

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