विगत दिनों नागपुर जिले के रामटेक में स्थित कवि गुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय में नवनिर्मित अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक भवन का उद्घाटन करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा संस्कृत भाषा के महत्व को रेखांकित करते संस्कृत के प्रचार-प्रसार हेतु व्यापक प्रयास किए जाने की आवश्यकता जताई है। संस्कृत को लोकप्रिय बनाने के लिए संघ प्रमुख ने इसे बोलचाल की भाषा बनाने पर विशेष जोर दिया । मुख्य अतिथि की आसंदी से मोहन भागवत ने कहा कि संस्कृत समझने और उसमें संवाद करने की क्षमता रखने में अंतर है। भागवत ने माना कि उन्होंने संस्कृत भाषा सीखी है लेकिन उसमें धाराप्रवाह नहीं बोल सकते। संस्कृत को घर घर तक पहुंचाने एवं इसे बोलचाल की भाषा बनाने की आवश्यकता है। भागवत ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार में कविकुल गुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए कि इस विश्वविद्यालय को सरकार का संरक्षण तो मिलेगा परंतु इसमें जनसहयोग भी बहुत जरूरी है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र के नागपुर जिले के अंतर्गत रामटेक में 1997 में कवि कुल गुरु कालिदास विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी जिसका ध्येय वाक्य “राष्ट्रहिताय संस्कृतम्” है। नागपुर से कालिदास के जुड़ाव के कारण इस विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए नागपुर के रामटेक नगर का चयन किया गया।
संघ प्रमुख ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति और चेतना की वाहक है। जो व्यक्ति संस्कृत जानता है वह भारत को गहराई से समझ सकता है ।भागवत ने कहा कि आत्म निर्भर बनने की आवश्यकता पर सभी सहमत हैं जिसके लिए बुद्धि और ज्ञान का विकास करना होता है। भाषा एक भाव है। स्वत्व कोई भौतिक चीज नहीं है। यह वैचारिक और सांस्कृतिक पहचान है। इसकी अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से होती है। यह जिम्मेदारी केवल शिक्षा संस्थानों की नहीं बल्कि पूरे समाज की है। भागवत ने कहा कि संस्कृत को समझना देश को समझने के समान है। संघ प्रमुख ने आशा जताई कि यह संस्थान संस्कृत भाषा को न केवल जीवंत बनाए रखेगा बल्कि इसे रोजमर्रा की बोलचाल की भाषा बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
संघ प्रमुख ने कहा कि हमारे लिए वैश्विक बाजार नहीं बल्कि वैश्विक परिवार महत्वपूर्ण है। यही वसुधैव कुटुम्बकम् है। भागवत ने याद दिलाया कि 2023 में जब भारत ने जी 23 समिट की अध्यक्षता की थी उसकी थीम वसुधैव कुटुम्बकम् ही थी।
संघ प्रमुख ने देश में संस्कृत को लोकप्रिय बनाने के लिए उक्त समारोह में जो सुझाव दिए हैं वे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और उस दिशा में सक्रिय प्रयास किए जाना चाहिए। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि प्राचीनतम भारतीय भाषाओं में अग्रणी संस्कृत भाषा का गौरवशाली इतिहास है। लगभग सभी धार्मिक ग्रंथों की रचना भी संस्कृत भाषा में ही की गई है इसीलिए इसे देववाणी माना गया है। विश्व के अनेक देशों ने संस्कृत के महत्व को स्वीकार किया है। वैज्ञानिक सूचनाओं के आदान प्रदान में भी इसे उपयोगी माना जा रहा है। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यदि संघ प्रमुख मोहन भागवत के उक्त विचारों पर गौर किया जाए तो उक्त समारोह में व्यक्त विचारों की उपादेयता स्वयंसिद्ध है।

कृष्णमोहन झा (लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)




